नारी शिक्षा ग्रहण

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नारी शिक्षा 
 
नारी शिक्षा एक चिंतन का विषय है! इतिहास के कुछ अंधकारमय काल को छोड्‌कर सदा ही नारी के शिक्षा एवं संस्कार को महत्व प्रदान किया गया। भारत में नारियों को पूज्य शक्तिस्वरूपा माना जाता रहा है। हिंदुओं में बालविवाह, सती की प्रथा इत्यादि कारणों से  नारियाँ शिक्षा से वंचित रहीं। राजा राममोहन राय ने बाल विवाह तथा सती की प्रथा को दूर करने का अथक परिश्रम किया । इन कुप्रथाओं के दूर होने से नारीशिक्षा को प्रोत्साहन मिला था ! कई स्कूल लड़कियों की शिक्षा के लिए खोले गए! धीरे धीरे नारियाँ उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर हो रही थीं! किंतु उनमें मुसलमान छात्राओं का अभाव था। क्योकि  मुसलमानी सभ्यता में परदे की प्रथा के कारण नारी शिक्षा पर अंकुश लगा दिया था! 
२०वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षो में भारत में इस बात पर ध्यान दिया गया कि नारी शिक्षा उनके और हम सभी के समाजिक जीवन के लिए उपयोगी है! अगर  महिलाये शिक्षित होंगी तो ही समाज और देश का विकास संभव होगा! इसी समय से मुसलमान नारियों ने भी उच्च शिक्षा में पदार्पण किया। नारी की उच्च शिक्षा में प्रगति हुई । प्राविधिक एवं व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण करने वाली छात्राएँ भी थीं । भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् यद्यपि नारी शिक्षा में पहले की अपेक्षा प्रगति हुई तथापि अन्य पाश्चात्य देशों की तुलना में यह कम है! आज भी कुछ जगहों पर नारी शिक्षा का आभाव है! उन्हें उनकी इच्छाओ के विरुद्ध पड़ने से रोक जाता है! उन्हें घरेलु काम काज सिखाया जाता है! क्योकि ऐसी धारणा बनी  हुई है की लडकिया पढ़ कर क्या करँगी, उन्हें तो आगे चल कर घर ही संभालना है! लकिन सोचने वाली बात यह है की अशिक्षित नारी की अपेक्षा एक शिक्षित नारी न केवल अपना बल्कि अपने घर का का भी सर्वागीण विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है ! 
अब ये राष्ट्र नारी की शिक्षा पर ध्यान दे रहI हैं तथा शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में उपयुक्त योग्यता प्राप्त कर नारी अपने सुशिक्षित राष्ट्रसमाज का निर्माण कर रही है। 
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