मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कोई भी नहीं करेगा??

मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कोई भी नहीं करेगा revoiceindia

◆कोंग्रेस पिछले साठ सालो से इस बात पर अड़ी हुयी थी तथा आज भी अड़ी हुई है कि, मंदिरो की संपत्ति और प्रशासन पर सरकार का नियंत्रण होना चाहिए। सरकार ही मंदिरो में आने वाले दान को कहाँ किस पर खर्च करना है यह तय करेगी और ट्रस्टियों की नियुक्ति करेगी।

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◆बीजेपी ने 1990 से 1997 तक कोंग्रेस के इस रूख का विरोध किया, और कहा कि मंदिरो को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाना चाहिए।

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◆1998 से 2004 के काल में बीजेपी के रूख में बदलाव आया और उन्हें भी लगने लगा कि मंदिरो पर नियंत्रण सरकार का ही होना चाहिए।

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◆2005 से 2009 तक बीजेपी के रूख में फिर से बदलाव आया। इस दौरान बीजेपी नेता पूरे देश में लोगो को यह समझाते घूम रहे थे कि, सरकारी नियंत्रण होने के कारण सरकारे मंदिरो की संपत्ति का दुरुपयोग करती है और धार्मिक संस्थाओ की क्षति होती है। इसीलिए धर्म को सरंक्षित करने के लिए यह बहुत जरुरी है कि मंदिरो और मठो का प्रशासन श्रद्धालुओ के हाथो में हो।

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◆तब मंदिरो को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करवाने की मुहीम चलाने वाले कार्यकर्ताओ ने बीजेपी से यह पूछा था कि, जब आप साढ़े छह साल सत्ता में थे तो आपने मंदिरो को सरकारी नियंत्रण से मुक्त क्यों नहीं किया ? तो बीजेपी नेताओ ने कहा कि इस बार पक्का कर देंगे।

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◆2009 में बीजेपी ने अपने मेनिफेस्टो में इस बात को फिर से रखा कि, मंदिरो को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना बीजेपी का एजेंडा है — https://indianrealist.wordpress.com/2009/04/03/bjp-promises-to-free-hindu-temples/

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◆2009 से 2014 तक बीजेपी नेता लगातार कोंग्रेस की इस बात पर आलोचना करते रहे कि, कोंग्रेस मंदिरो को सरकारी नियंत्रण से मुक्त नहीं कर रही है। इससे दान से प्राप्त संपत्तियों का हस्तांतरण मिशनरीज को किया जा रहा है और मिशनरीज ट्रस्ट इसी पैसे का इस्तेमाल धर्मान्तरण में कर रहे है। देश के विभिन्न क्षेत्रो से हिंदूवादी कार्यकर्ता भी ऐसी ही मांग कर रहे थे। लेकिन कोंग्रेस ने तब भी स्पष्ट कर दिया था कि, हिन्दू चाहे उल्टे होकर लटक ही क्यों न ले, लेकिन मंदिर सरकारों के नियंत्रण में ही रहेंगे।

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◆2012 में ही सरकार ने दक्षिण भारत के मंदिरो से होलसेल में सोना उठाने और बदले में गोल्ड बांड थमा देने का की योजना बनायी। लेकिन तब हिन्दू कार्यकर्ताओ और बीजेपी ने कोंग्रेस के इस रूख का कड़ा विरोध किया।

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◆मई 2014 में बीजेपी फिर से सत्ता में आयी और मई, 2014 से ही बीजेपी को फिर से लगने लगा कि मंदिरो की संपत्ति और प्रशासन पर सरकार का कब्ज़ा बेहद जरुरी है। 2015 आते आते बीजेपी इस बात पर भी राजी हो गयी कि, मंदिरो को नियमित रूप से प्राप्त दान के अलावा उनके स्वर्ण भंडारो को भी सरकारी नियंत्रण में लिया जाना चाहिए। अतः मंदिरो का सोना खींचने के लिए बीजेपी ने सोने के बदले बांड देने की योजना का क्रियान्वयन शुरू किया।

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◆जहाँ तक आम आदमी पार्टी का सवाल है, उनका इस बारे में स्पष्ट कहना है कि, “यह बहस लायक विषय ही नहीं है कि मंदिरों पर किसका नियंत्रण होना चाहिए। नियंत्रण सरकार का था सरकार का ही है और सरकार का ही रहेगा” !

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  • इस प्रकरण से हमें यह सबक लेने चाहिए :

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★1. कोंग्रेस का रूख इस बारे में पिछले 60 सालो से बिल्कुल स्पष्ट है, और इसमें उन्होंने कोई बदलाव नहीं किया है। उनका आज भी यही कहना है कि मंदिरों की सम्पत्ति पर सरकार का ही नियंत्रण रहेगा। जो चाहे करो। वोट देना है दो न देना है न दो।

★2. बीजेपी जैसे ही सत्ता में आती है उन्हें इस कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है कि, मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में ही रखा जाना चाहिए। लेकिन जैसे ही वे विपक्ष में आते है वे मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की वकालत करने लगते है।

★3. आम आदमी पार्टी का रूख बिलकुल साफ़ है। उन्हें इस मुद्दे पर बात ही नहीं करनी है। वो मंदिरों को हिन्दुओ के नियंत्रण में देने के सख्त खिलाफ है।

★4. अंध भगतो की सभी प्रजातियाँ अपने नेताओं के सुर में सुर मिलाने के लिए बाध्य है। उनकी स्थिति भीष्म पितामह जैसी है, जो हस्तिनापुर की गद्दी से बंधे हुए है। हर हाल में। उदाहरण के लिए मोदी साहेब के अंध भगत २०१४ से पहले तक मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का समर्थन कर रहे थे लेकिन जैसे ही मोदी साहेब ने पीएम बनते ही इस मुद्दे पर यू टर्न लिया वैसे ही मोदी साहेब के अंध भगत भी नागरिको को यह बात समझाने लगे कि, “अरे भाई मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना तो अब कोई मुद्दा ही नहीं है, अब तो मुद्दा विकास है। और विकास के लिए क़ुरबानी तो देनी ही होती है। तो देश के लिए थोड़ी कुर्बानी आप भी दो और मंदिरों से भी दिलवाओ”

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★5. आप कोंग्रेस को वोट करे या आम आदमी पार्टी को या बीजेपी को, परिणाम एक ही होगा — मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त इनमे से कोई भी नहीं करेगा। कोंग्रेस और आम आदमी पार्टी इस मुद्दे पर सामने से खिलाफ है और बीजेपी अंदर से।

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★★समाधान ?

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◆हमें मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना है तो इसके लिए ऐसी व्यवस्था स्थापित करने का क़ानून गेजेट में छपवाना होगा। तो हम इसके लिए विभिन्न पार्टियों को वोट क्यों करे ? क्योंकि आप वोट किसे भी करें, सभी पार्टियां सरकार में आने पर मंदिरो के कोष लूट कर सरकारी खजाने में जमा करने की नीति पर भी काम कर रही है। लेकिन ऐसा कानून हम मौजूदा सरकार से भी लागू करवा सकते है। सरकार बदलने की जरूरत नहीं है। इसीलिए अपने सांसद को sms से आदेश भेजिए कि, मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के कानूनी ड्राफ्ट को गेजेट में प्रकाशित किया जाये।

 

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