बेटीयो का खेल

hqdefault
बेटीयो का खेल 
 
अत्यधिक प्रतिस्प्रधा के क्षेत्र  मे चुनौतीयो का सामना करने के लिए व्यक्तिगत  प्रतिभा  और समर्पण तो आवश्यक है ही, लेकिन इसके साथ साथ खिलाड़ियो को समर्थन और सहयोग देना भी जरूरी है । अब तक के ओलंपिक्स खेलो मे महिला कुश्ती मे साक्षी मलिक द्वारा  कांस्य पदक जीतने के अलावा, अभी हम अन्य  पदक हासिल करने मे विफल रहे है । पीवी सिंधु ने ओलंपिक्स  बैडमिंटन महिला स्पर्धा के फाइनल में  प्रवेश करते हुए इतिहास रच दिया! दिपा करमाकर ओलंपिक्स मे बहतरीन प्रदर्शन के बाबजूद भी अंतिम पलो मे या तो कुछ व्यक्तिगत कमियो के या खराब किसमत के चलते पदक जीतने से एक कदम दूर रह गयी। ललिता बब्बर ने प्रथम दस धावको मे अपना स्थान बनाया । महिला खिलाड़ियो ने ओलंपिक्स खेलो मे पिछले कई वर्षो के प्रदर्शन से अच्छा प्रदर्शन कर भारत को गौरवान्वित किया है । हमारे देश की समस्या यह है कि किक्रेट के अलावा यहा अन्य खेलो को कोई तवज्जो दी ही नही जाती। न ही उनहे बेहतर प्रशिक्षण, सुविधा उपकरण, कोच और वित्तीय सहायता दी जाती है । दिपा करमाकर और ललिता बब्बर को विश्व स्तर का एथलीट बनने के लिए के लिए कितने संघर्षो का सामना करना पडा है । इसके अलावा सबसे बड़ी विडम्बना, हमारे देश मे लिंग भेदभाव मौजूद है । लङकियो को खेलकूद के लिए प्रेरित नही किया जाता । और जो अपना कौशल सिद्ध करती है उनहे भी सुसराल का का नाम लेकर खेलो के लिए प्रोत्साहित नही किया जाता है । अधिकांश परिवार भी खेलने वाली बहु को पसंद नही करते । ओलंपिक्स मे भारत का स्थान चाहे जो भी रहे। भारतीय खेलो विशेष कर बेटियो को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार और समाज को दीर्घकालीन दृष्टिकोण अपनाना चाहिए ।
loading...