ई-बुक और किताब

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 ई-बुक और किताब 


लगभग एक दशक पहले कागज पर छपी हुई किताबो को श्रधांजलि देनी शुरू कर दी गयी थी। कहा जाने लगा था कि पढाई और अध्यन का भविष्य ई-बुक है। बाजार भी ई-बुक रीडरो से भर गया था । किताबो के ई-संस्करणों की बाजार मे जैसे बाढ सी आ गयी थी । और ईटरनेट ने इसे जैसे उंगलियो का खेल बना दिया । किताबो के ई-संस्करणों के ऐसे फारमेट उपलब्ध है, जिन्हें हम कभी भी कहीं भी मोबाइल, लैपटॉप आदि पर पढ सकते है । इन सबका असर यह लगने लगा था कि कागज पर छपी किताबो के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है । इससे लेखको मे निराशा की लहर चल पङी, क्योकि किताबो के ई-संस्करणों की सरल उपलब्धता और लोकप्रियता ने छपी किताबो की कीमत को कम कर दिया था !। पर समय निकलते किताबो का यह ई-बाजार ठंडा पढने लगा। इससे छपी हुई किताबो के बाजार मे आ रही गिरावट थम गई । इलेक्ट्रोनिक अक्षरो को पढने वाले पन्ने पलटने की दुनिया मे वापस लौट आये। जो श्रधांजलि छपी किताबो को दी गई थी, अब ई-बुक को दी जाने लगी । हालांकि ई-बुक छात्रो के लिए काफी उपयोगी भी साबित हुई है । पर कागजो पर छपी किताबो को पढने की आदत सदियो से हमारे संस्कारो मे है। ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि कोई नई और क्रांतिकारी तकनीक आई और बाजार मे छा गई, लेकिन कुछ दिन बाद ही पुरानी तकनीक ने उसे शिकस्त दे दी हो।

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