शवो की ऐसी दुर्दशा

conditions of deadbodies revoiceindia
जङ होता समाज 
 
अंतिम  संस्कार  जीवन का आखिरी संस्कार है । परिजन मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार  पूरे विधि विधान से करते है । पर मरने के बाद शवो की दुर्दशा के मामले केवल प्रशासन ही नही पूरे समाज बल्कि यूँ  कहे कि पूरी मानवता को शर्मसार कर रहे  है। लावारिस शवो की दुर्गति  के मामले तो समय समय पर सुनने को मिलते  है । पर आज के संवेदनहीन समाज मे परिवार के सामने ही शवो की दुर्गति हो रही है, और वे बेबस कुछ नही कर पाते। अभी हाल ही मे ओडिशा मे पुलिस एम्बुलेंस न मिलने पर एक आदिवासी मूल के  आदमी द्वारा अपनी पत्नी के शव को कंधे पर डालकर अपने घर ले कर जाने की खबर हम सबने सुनी भी और देखी भी। यह गरीब  आदमी दस किलोमीटर शव को कंधे पर ले कर चलता रहा । इस मामले ने विकास के सभी दावो को खोखला साबित कर दिया । राजधानी दिल्ली मे एक व्यक्ति टेंपो की चपेट मे आकर सङक पर पङे पड़े  दम तोड देता है, और लोग देखते हुए निकल जाते है । एक तो उसके मोबाइल फोन और पर्स ही चुरा कर ले जाता है । लोकतंत्र मे प्रत्येक वयक्ति को महत्वपूर्ण माना गया है । उसी लोकतंत्र मे शवो की ऐसी दुर्दशा । शवो की दुर्गति पर मौन रहने वाले लोग भी किसी चलती फिरती लाश से कम नही है । गौ मांस पर शोर मचाने वालो को यह नही दिखाई देता की आदमी के मांस की क्या दुर्दशा हो रही है । गरीब  इस देश की व्यवस्था मे इस तरह जकङा है कि जिन्दा रहते हुए भी उसके साथ मुर्दे जैसा व्यवहार किया जाता है, और मुर्दा होने पर उससे भी बूरा। यह है हमारे जङ समाज की वास्तविकता। 
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